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पप्पू बन गया पापा
राजनीति

पप्पू बन गया पापा

हरिद्वार। राहुल गांधी वर्तमान भारत के जननायक बनकर उभर रहे हैं । देश की जनता उनको जितना पसंद कर रही है उनके विरोधी और विशेष कर वह शक्तियां जो देश को आजाद कराने वाले महात्मा गांधी को बर्दाश्त नहीं कर पायीं उनकी आंखों में राहुल गांधी कंकर बनकर कसक रहे हैं । नेहरू परिवार की पूरी पृष्ठभूमि देश और समाज के हित की रही है, इस परिवार ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के रूप में शहादत देकर इस देश को अपने लहू से सींचा है । राहुल गांधी के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी भी सुरक्षा घेरा तोड़कर आम जनता के बीच जाकर जनसामान्य से मिलते थे, उसी तर्ज पर राहुल गांधी भी कई शहरों और प्रदेशों में शो कर चुके हैं । उत्तराखंड , राजस्थान, उत्तर प्रदेश और 22 अगस्त को महाराष्ट्र के पुणे में हुए कार्यक्रम के बाद उनकी सुरक्षा के बारे में सोचा जाना चाहिए कि जो नेता आम जनता के बीच जाकर अपना मंच साझा करवा रहा है उसकी सुरक्षा में सेंध लगाई जा सकती है ? राहुल गांधी को स्वयं , उनकी सुरक्षा में लगे दल एवं कांग्रेस को इस विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। राहुल गांधी को पप्पू घोषित करने में सत्तारूढ़ दल के एक नेता ने आम जनता के करों से प्राप्त हजारों करोड़ों की धनराशि खर्च कर डाली, वह खानदानी नेता पप्पू न रहकर अब भारत की जनता विशेष कर युवा पीढ़ी (जिसे देश का भविष्य कहते हैं) का पापा (संरक्षक)बन गया है । रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था "जब-जब होइ धर्म की हानी, बाढ़हिं असुर ,अधम ,अभिमानी। तब- तब प्रभु धरि विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा"। जब-जब पृथ्वी पर धर्म कम होता है और पापी लोग ताकतवर होते हैं ,तब -तब भगवान अलग-अलग रूप लेकर अच्छे लोगों का दुख दूर करते हैं । मानस की इस चौपाई को यदि वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष से जोड़कर देखा जाए तो बिल्कुल स्पष्ट हो रहा है कि वर्तमान केंद्र और राज्य सरकार ने एक अपंजीकृत संगठन के साथ सांठ-गांठ कर अयोध्या के उस राम मंदिर में खुली डकैती डाली जिससे देश ही नहीं पूरे विश्व में रह रहे करोड़ों राम भक्तों की आस्था जुडी थी। विडंबना देखें कि जिस प्रदेश का मुखिया स्वयं धार्मिक स्वरूप धारण कर सत्ता का संचालन कर रहा है उसने धर्म स्थल के डकैतों को कितनी सतर्कता से बचाया , इससे बड़ी धर्म की हानि कोई हो नहीं सकती। जिस सरकार ने प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया हो वह पेपर लीक होने का रिकॉर्ड बनाने में लगी है। उसी की राज्य सरकारें स्कूलों में ताले लगवा रहीं तथा यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर चलाने की घोषणाएं कर रही हैं और यदि छात्र अपने हक की मांग करें तो उन पर लाठियां, आंसू गैस और बंदूकों के छर्रों की बौछार की जा रही है। सरकार संसद में न जाए और विपक्षी दलों की सरकारें तोड़ने में अपनी पूरी ताकत लगा दे, किसी अपराध के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए विपक्षी नेता को सात- आठ घंटे धरना देना पड़े , इससे बड़ी तानाशाही और हठ धर्मिता कोई हो नहीं सकती। हमारे देश की जमीन पर कोई पड़ोसी देश कब्जा कर ले और सरकार कहे कि हमारी एक इंच जमीन किसी ने नहीं कब्जायी, ऑपरेशन सिंदूर में हमारे जवान शहीद हो जाएं और हमारी सरकार कह दे कि हमारी कोई जनहानि नहीं हुई है, ऐसी झूठी सरकार को आखिर इस देश की जनता और कब तक बर्दाश्त करेगी ? इतिहास गवाह है कि हमारे देश में जब-जब तानाशाही का तांडव हुआ कोई न कोई राजनेता अवश्य जन सामान्य का मसीहा बनकर उभरा और उसने देश को तानाशाही के चुंगल से मुक्त कराकर संविधान सम्मत सत्ता को स्थापित किया। संविधान की जय हो , भारत माता की जय हो।

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राजनीति

सत्ता पर गहराता संकट

समय और सत्ता दोनों परिवर्तनशील होते हैं, एक पुरानी कहावत है कि 12 वर्ष बाद बदलाव आता ही है। इतिहास का समय देखें या भारत की सत्ता‌, तीसरे कार्यकाल में बदलाव देखे गए हैं। प्रधानमंत्रियों में सर्वाधिक कार्यकाल जवाहरलाल नेहरू लगभग 17 वर्ष, इंदिरा गांधी लगभग 16 वर्ष, नरेंद्र मोदी 26 मई 2014 से अब तक, जबकि डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल 10 वर्ष का रहा। मुख्यमंत्रियों में ममता बनर्जी, शीला दीक्षित और लालू प्रसाद यादव ने 15-15 वर्ष की पारी खेली। प्रकाश सिंह बादल 19 साल, भजनलाल लगभग 12 वर्ष, शिवराज सिंह चौहान साढे 16 वर्ष तो नरेंद्र मोदी भी लगभग साढे 12 वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। सत्ता के समय पर निगाह डाली जाए तो तीसरा कार्यकाल सभी पर भारी पड़ा और सत्ता में बदलाव हुआ। इन सब में लंबी पारी खेली नीतीश कुमार ने जिन्होंने 19 वर्ष में 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, इनमें कोई भी राजनेता दो दशक का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। अब तक हुए राजनेताओं के कार्यकाल में बदलाव का मुख्य कारण उनका अहंकार रहा है,जब भी किसी की सत्ता पुरानी होती है तो नेता में अभियान अवश्य आता है जो उसके पतन का कारण बनता है। केंद्र और यूपी की वर्तमान सरकार पर भी यही फार्मूला लागू हो रहा है। दोनों जगह सत्ता की उलट - पलट का खेल चल रहा है,यह अधिसंख्य जनता की नाराजगी का कारण है। जिस प्रकार केंद्र की सत्ता से कोई वर्ग खुश नहीं है उसी प्रकार का वातावरण उत्तर प्रदेश में भी है। जहां तक सरकारों में घोटालों का सवाल है तो यह तो सत्ता के स्वभाव में सम्मिलित हो गए हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित राम मंदिर में खुलेआम हुई दान के धन की लूट ने केंद्र तथा यूपी की दोनों सरकारों की चूलें ढीली कर दी हैं जो सत्ता में बदलाव का मुख्य कारण बनेगा और संघ के संरक्षण में हुए इस दान चोरी कांड ने भाजपा को एक लंबे समय तक सत्ता से दूर होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

सृष्टि में सर्वोपरि महादेव : देवों के देव महादेव, जिनकी महिमा अपरंपार
धर्म

सृष्टि में सर्वोपरि महादेव : देवों के देव महादेव, जिनकी महिमा अपरंपार

हरिद्वार। सनातन धर्म में 33 कोटि देवता हैं, लेकिन सभी देवों में सर्वोपरि महादेव हैं। सृष्टि के पालनहार श्रीहरि ने भी उनका स्तवन किया है और उनके त्रेता अवतारी भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व सेतुबंध रामेश्वरम् की स्थापना की तथा द्वापर के अवतारी भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुत्र शाम्ब की आरोग्यता के लिए भोलेनाथ की विशेष आराधना की थी। भगवान शिव की महिमा का महत्व जानने के लिए आज हमने दक्ष नगरी कनखल के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीताविज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज से विशेष साक्षात्कार किया जो गीता एवं गायत्री के प्रचारक तथा शतायु को पार कर चुके दुर्लभ दर्शनीय वयोवृद्ध ज्ञानवृद्ध संत हैं। महाराज श्री ने बताया कि ---- सृष्टि के सृजनकाल सतयुग, त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्त तथा अनुयायी भगवान शिव के ही हैं। भोले बाबा श्रीहरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम हैं, कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्ण है। नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही हैं, रूप अलग हैं लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं।ाल सतयुग त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्ति तथा अंगाई भगवान शिव के ही हैं भोले बाबा श्री हरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम है कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्णा है नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही है रूप अलग है लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं। महादेव की महिमा का वर्णन करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जो सबकी रक्षा कर सकता है वही महादेव है और सब की रक्षा वही कर सकता है जो सबसे बलवान हो, बलवान वही होता है जिसे ज्ञान हो और परमात्मा के नाम से जाना जाता हो जो श्रोत्रिय भी हो और ब्रह्मनिष्ठ भी हो। भोले बाबा श्रोत्रिय भी हैं और ब्रह्मनिष्ठ भी हैं। भगवान शिव के महादेव बनने के वृत्तांत को श्रावण मास एवं देवासुर संग्राम से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन श्रावण मास में ही हुआ था जिसमें 14 रत्न निकले उसी में एक विष भी था। सभी रत्नों को तो देवताओं ने आपस में बांट लिया लेकिन विष लेने को कोई तैयार नहीं हुआ। सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की तो उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण कर नील पर्वत पर विश्राम किया तथा गंगा की नीलधारा में स्नान कर विष की गर्मी को शांत किया। भगवान ने विष पीकर संपूर्ण विश्व की रक्षा की और सब की रक्षा करने के कारण ही वे महादेव कहलाए। देवताओं का अनुरोध स्वीकार करने पर ही सभी देवताओं ने उन्हें महादेव के नाम से पुकारा। महादेव सृष्टि के सृजक भी हैं और संहारक भी। देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक चार माह तक चातुर्मास में जब श्रीहरि शयनकाल के लिए क्षीरसागर में चले जाते हैं तो भगवान शिव ही सृष्टि का संचालन करते हैं, जिसमें एक माह श्रावण मास में वे हरिद्वार में रहकर ही सृष्टि का संचालन करते हैं। मां गंगा जब स्वर्ग से धराधाम पर उतरीं तो भगवान शिव की जटाओं से होकर ही आई थीं तभी से भगवान शिव को गंगाजल प्रिय है।भगवान शिव ने श्रावण मास में ही विष को कंठ में धारण किया था जिसकी गर्मी (पाप) को शांत करने के लिए गंगाजल का प्रयोग किया गया था तभी से संपूर्ण भारतवर्ष के श्रद्धालु श्रावण मास में हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में भगवान के निराकार स्वरूप शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। श्रावण मास में रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। देश में शिवालयों की संख्या भी सर्वाधिक है और सभी देवी देवताओं की तुलना में भगवान महादेव के भक्त भी सर्वाधिक हैं। कावड़ यात्रा का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि पहली कावड़ भगवान परशुराम ने हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर पुरा महादेव मंदिर में अभिषेक किया था तभी से देश के कोने-कोने से श्रद्धालु हरिद्वार आकर हर की पैड़ी से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।भगवान महादेव को गंगाजल प्रिय है और वह जलाभिषेक से ही प्रसन्न हो जाते हैं। कावड़ यात्रियों की संख्या वर्ष प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है, जलाभिषेक से भगवान शिव के प्रसन्न होने और शीघ्र प्रसन्न होने के कारण ही उनको महादेव कहा जाता है, इसीलिए महादेव के भक्तों की संख्या अन्य देवताओं की तुलना में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

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