राजनीति
3 Articles
भाजपा में हो गई दुर्दिनों की शुरुआत
बरेली । जिस भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने से पूर्व देश की जनता के अच्छे दिन आने का वादा किया था अब उसी के बुरे दिन आने प्रारंभ हो गए हैं। गत 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर मंतर से प्रारंभ हुए काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद तो भाजपा में ऐसी अप्रत्याशित घटना घटित हुई जिसको भाजपा के बड़े नेता यह कहते थे कि हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते हैं , उनको अपने मंत्री का इस्तीफा करना पड़ा। भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को संसद की कार्रवाई से मुंह छुपाना पड़ा, प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री का मानसून सत्र से गायब होने को देश की जनता ही नहीं विदेशों ने भी गंभीरता से लिया है और संघ प्रमुख मोहन भागवत को अपनी विदेश यात्रा में विरोध का सामना करना पड़ा। रही सही कसर एथेनॉल ने पूरी कर दी, तो चीनी के दामों में आई बंपर तेजी ने भाजपा सरकार की चूलें दिला दी। जिस राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर भाजपा सत्ता में आई थी उसी अयोध्या के राम मंदिर में हुई चंदा चोरी और चोरी के मुख्य रूप से जिम्मेदार ट्रस्टियों को बचाने के लिए केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयासों ने भाजपा की रही सही कसर भी पूरी कर दी। न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की जनता की नजर में भाजपा का असली चेहरा अब सामने आ गया है। सोशल मीडिया में एक कहावत आजकल तेजी से वायरल हो रही है कि जब किसी के बुरे दिन आते हैं तो ऊंट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट लेता है , वही कहावत आजकल बीजेपी पर लागू हो रही है। भाजपा ने सत्ता में आने से पूर्व लगभग तीन दर्जन छोटे-छोटे दलों को जोड़कर अपना कुनबा तैयार किया था ईडी और सीबीआई के माध्यम से विपक्षी दलों में भय का वातावरण बनाकर अन्य दलों के कई बड़े-बड़े नेताओं को अपनी पार्टी में सम्मिलित कर इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर दिया कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। पार्टी न केवल कुनबे से बड़ी हुई बल्कि भाजपा संगठन के पास देश के अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में सर्वाधिक फंड भी जमा है । संघ के भी आलीशान कार्यालय बन गए हैं ,भाजपा के केंद्रीय कार्यालय से लेकर प्रदेश और जिला स्तरीय कार्यालयों की काया पलट गयी,आज उस भाजपा को अपनी सत्ता बचाने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं । सहयोगी दल भी आंखें दिखा रहे हैं, केंद्र एवं राज्यों के मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की नहीं चल रही। यूपी के राज्यपाल ने तो अपने ही मुख्यमंत्री के क्षेत्र में जाकर वहां पर 50 कमियां निकाल दींं जो पार्टी के बुरे दिन आने का ही संकेत है।
पप्पू बन गया पापा
हरिद्वार। राहुल गांधी वर्तमान भारत के जननायक बनकर उभर रहे हैं । देश की जनता उनको जितना पसंद कर रही है उनके विरोधी और विशेष कर वह शक्तियां जो देश को आजाद कराने वाले महात्मा गांधी को बर्दाश्त नहीं कर पायीं उनकी आंखों में राहुल गांधी कंकर बनकर कसक रहे हैं । नेहरू परिवार की पूरी पृष्ठभूमि देश और समाज के हित की रही है, इस परिवार ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के रूप में शहादत देकर इस देश को अपने लहू से सींचा है । राहुल गांधी के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी भी सुरक्षा घेरा तोड़कर आम जनता के बीच जाकर जनसामान्य से मिलते थे, उसी तर्ज पर राहुल गांधी भी कई शहरों और प्रदेशों में शो कर चुके हैं । उत्तराखंड , राजस्थान, उत्तर प्रदेश और 22 अगस्त को महाराष्ट्र के पुणे में हुए कार्यक्रम के बाद उनकी सुरक्षा के बारे में सोचा जाना चाहिए कि जो नेता आम जनता के बीच जाकर अपना मंच साझा करवा रहा है उसकी सुरक्षा में सेंध लगाई जा सकती है ? राहुल गांधी को स्वयं , उनकी सुरक्षा में लगे दल एवं कांग्रेस को इस विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। राहुल गांधी को पप्पू घोषित करने में सत्तारूढ़ दल के एक नेता ने आम जनता के करों से प्राप्त हजारों करोड़ों की धनराशि खर्च कर डाली, वह खानदानी नेता पप्पू न रहकर अब भारत की जनता विशेष कर युवा पीढ़ी (जिसे देश का भविष्य कहते हैं) का पापा (संरक्षक)बन गया है । रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था "जब-जब होइ धर्म की हानी, बाढ़हिं असुर ,अधम ,अभिमानी। तब- तब प्रभु धरि विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा"। जब-जब पृथ्वी पर धर्म कम होता है और पापी लोग ताकतवर होते हैं ,तब -तब भगवान अलग-अलग रूप लेकर अच्छे लोगों का दुख दूर करते हैं । मानस की इस चौपाई को यदि वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष से जोड़कर देखा जाए तो बिल्कुल स्पष्ट हो रहा है कि वर्तमान केंद्र और राज्य सरकार ने एक अपंजीकृत संगठन के साथ सांठ-गांठ कर अयोध्या के उस राम मंदिर में खुली डकैती डाली जिससे देश ही नहीं पूरे विश्व में रह रहे करोड़ों राम भक्तों की आस्था जुडी थी। विडंबना देखें कि जिस प्रदेश का मुखिया स्वयं धार्मिक स्वरूप धारण कर सत्ता का संचालन कर रहा है उसने धर्म स्थल के डकैतों को कितनी सतर्कता से बचाया , इससे बड़ी धर्म की हानि कोई हो नहीं सकती। जिस सरकार ने प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया हो वह पेपर लीक होने का रिकॉर्ड बनाने में लगी है। उसी की राज्य सरकारें स्कूलों में ताले लगवा रहीं तथा यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर चलाने की घोषणाएं कर रही हैं और यदि छात्र अपने हक की मांग करें तो उन पर लाठियां, आंसू गैस और बंदूकों के छर्रों की बौछार की जा रही है। सरकार संसद में न जाए और विपक्षी दलों की सरकारें तोड़ने में अपनी पूरी ताकत लगा दे, किसी अपराध के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए विपक्षी नेता को सात- आठ घंटे धरना देना पड़े , इससे बड़ी तानाशाही और हठ धर्मिता कोई हो नहीं सकती। हमारे देश की जमीन पर कोई पड़ोसी देश कब्जा कर ले और सरकार कहे कि हमारी एक इंच जमीन किसी ने नहीं कब्जायी, ऑपरेशन सिंदूर में हमारे जवान शहीद हो जाएं और हमारी सरकार कह दे कि हमारी कोई जनहानि नहीं हुई है, ऐसी झूठी सरकार को आखिर इस देश की जनता और कब तक बर्दाश्त करेगी ? इतिहास गवाह है कि हमारे देश में जब-जब तानाशाही का तांडव हुआ कोई न कोई राजनेता अवश्य जन सामान्य का मसीहा बनकर उभरा और उसने देश को तानाशाही के चुंगल से मुक्त कराकर संविधान सम्मत सत्ता को स्थापित किया। संविधान की जय हो , भारत माता की जय हो।
सत्ता पर गहराता संकट
समय और सत्ता दोनों परिवर्तनशील होते हैं, एक पुरानी कहावत है कि 12 वर्ष बाद बदलाव आता ही है। इतिहास का समय देखें या भारत की सत्ता, तीसरे कार्यकाल में बदलाव देखे गए हैं। प्रधानमंत्रियों में सर्वाधिक कार्यकाल जवाहरलाल नेहरू लगभग 17 वर्ष, इंदिरा गांधी लगभग 16 वर्ष, नरेंद्र मोदी 26 मई 2014 से अब तक, जबकि डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल 10 वर्ष का रहा। मुख्यमंत्रियों में ममता बनर्जी, शीला दीक्षित और लालू प्रसाद यादव ने 15-15 वर्ष की पारी खेली। प्रकाश सिंह बादल 19 साल, भजनलाल लगभग 12 वर्ष, शिवराज सिंह चौहान साढे 16 वर्ष तो नरेंद्र मोदी भी लगभग साढे 12 वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। सत्ता के समय पर निगाह डाली जाए तो तीसरा कार्यकाल सभी पर भारी पड़ा और सत्ता में बदलाव हुआ। इन सब में लंबी पारी खेली नीतीश कुमार ने जिन्होंने 19 वर्ष में 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, इनमें कोई भी राजनेता दो दशक का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। अब तक हुए राजनेताओं के कार्यकाल में बदलाव का मुख्य कारण उनका अहंकार रहा है,जब भी किसी की सत्ता पुरानी होती है तो नेता में अभियान अवश्य आता है जो उसके पतन का कारण बनता है। केंद्र और यूपी की वर्तमान सरकार पर भी यही फार्मूला लागू हो रहा है। दोनों जगह सत्ता की उलट - पलट का खेल चल रहा है,यह अधिसंख्य जनता की नाराजगी का कारण है। जिस प्रकार केंद्र की सत्ता से कोई वर्ग खुश नहीं है उसी प्रकार का वातावरण उत्तर प्रदेश में भी है। जहां तक सरकारों में घोटालों का सवाल है तो यह तो सत्ता के स्वभाव में सम्मिलित हो गए हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित राम मंदिर में खुलेआम हुई दान के धन की लूट ने केंद्र तथा यूपी की दोनों सरकारों की चूलें ढीली कर दी हैं जो सत्ता में बदलाव का मुख्य कारण बनेगा और संघ के संरक्षण में हुए इस दान चोरी कांड ने भाजपा को एक लंबे समय तक सत्ता से दूर होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।