सृष्टि में सर्वोपरि महादेव : देवों के देव महादेव, जिनकी महिमा अपरंपार
Published: Monday, August 17, 2026 at 8:53 AM
हरिद्वार। सनातन धर्म में 33 कोटि देवता हैं, लेकिन सभी देवों में सर्वोपरि महादेव हैं। सृष्टि के पालनहार श्रीहरि ने भी उनका स्तवन किया है और उनके त्रेता अवतारी भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व सेतुबंध रामेश्वरम् की स्थापना की तथा द्वापर के अवतारी भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुत्र शाम्ब की आरोग्यता के लिए भोलेनाथ की विशेष आराधना की थी।
भगवान शिव की महिमा का महत्व जानने के लिए आज हमने दक्ष नगरी कनखल के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीताविज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज से विशेष साक्षात्कार किया जो गीता एवं गायत्री के प्रचारक तथा शतायु को पार कर चुके दुर्लभ दर्शनीय वयोवृद्ध ज्ञानवृद्ध संत हैं। महाराज श्री ने बताया कि ----
सृष्टि के सृजनकाल सतयुग, त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्त तथा अनुयायी भगवान शिव के ही हैं। भोले बाबा श्रीहरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम हैं, कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्ण है। नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही हैं, रूप अलग हैं लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं।ाल सतयुग त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्ति तथा अंगाई भगवान शिव के ही हैं भोले बाबा श्री हरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम है कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्णा है नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही है रूप अलग है लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं।
महादेव की महिमा का वर्णन करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जो सबकी रक्षा कर सकता है वही महादेव है और सब की रक्षा वही कर सकता है जो सबसे बलवान हो, बलवान वही होता है जिसे ज्ञान हो और परमात्मा के नाम से जाना जाता हो जो श्रोत्रिय भी हो और ब्रह्मनिष्ठ भी हो। भोले बाबा श्रोत्रिय भी हैं और ब्रह्मनिष्ठ भी हैं।
भगवान शिव के महादेव बनने के वृत्तांत को श्रावण मास एवं देवासुर संग्राम से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन श्रावण मास में ही हुआ था जिसमें 14 रत्न निकले उसी में एक विष भी था। सभी रत्नों को तो देवताओं ने आपस में बांट लिया लेकिन विष लेने को कोई तैयार नहीं हुआ। सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की तो उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण कर नील पर्वत पर विश्राम किया तथा गंगा की नीलधारा में स्नान कर विष की गर्मी को शांत किया। भगवान ने विष पीकर संपूर्ण विश्व की रक्षा की और सब की रक्षा करने के कारण ही वे महादेव कहलाए। देवताओं का अनुरोध स्वीकार करने पर ही सभी देवताओं ने उन्हें महादेव के नाम से पुकारा। महादेव सृष्टि के सृजक भी हैं और संहारक भी। देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक चार माह तक चातुर्मास में जब श्रीहरि शयनकाल के लिए क्षीरसागर में चले जाते हैं तो भगवान शिव ही सृष्टि का संचालन करते हैं, जिसमें एक माह श्रावण मास में वे हरिद्वार में रहकर ही सृष्टि का संचालन करते हैं।
मां गंगा जब स्वर्ग से धराधाम पर उतरीं तो भगवान शिव की जटाओं से होकर ही आई थीं तभी से भगवान शिव को गंगाजल प्रिय है।भगवान शिव ने श्रावण मास में ही विष को कंठ में धारण किया था जिसकी गर्मी (पाप) को शांत करने के लिए गंगाजल का प्रयोग किया गया था तभी से संपूर्ण भारतवर्ष के श्रद्धालु श्रावण मास में हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में भगवान के निराकार स्वरूप शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। श्रावण मास में रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। देश में शिवालयों की संख्या भी सर्वाधिक है और सभी देवी देवताओं की तुलना में भगवान महादेव के भक्त भी सर्वाधिक हैं।
कावड़ यात्रा का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि पहली कावड़ भगवान परशुराम ने हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर पुरा महादेव मंदिर में अभिषेक किया था तभी से देश के कोने-कोने से श्रद्धालु हरिद्वार आकर हर की पैड़ी से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।भगवान महादेव को गंगाजल प्रिय है और वह जलाभिषेक से ही प्रसन्न हो जाते हैं। कावड़ यात्रियों की संख्या वर्ष प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है, जलाभिषेक से भगवान शिव के प्रसन्न होने और शीघ्र प्रसन्न होने के कारण ही उनको महादेव कहा जाता है, इसीलिए महादेव के भक्तों की संख्या अन्य देवताओं की तुलना में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
भगवान शिव की महिमा का महत्व जानने के लिए आज हमने दक्ष नगरी कनखल के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीताविज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज से विशेष साक्षात्कार किया जो गीता एवं गायत्री के प्रचारक तथा शतायु को पार कर चुके दुर्लभ दर्शनीय वयोवृद्ध ज्ञानवृद्ध संत हैं। महाराज श्री ने बताया कि ----
सृष्टि के सृजनकाल सतयुग, त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्त तथा अनुयायी भगवान शिव के ही हैं। भोले बाबा श्रीहरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम हैं, कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्ण है। नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही हैं, रूप अलग हैं लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं।ाल सतयुग त्रेता तथा द्वापर में भगवान शिव की आराधना का वर्णन है और कलयुग में सर्वाधिक भक्ति तथा अंगाई भगवान शिव के ही हैं भोले बाबा श्री हरि को अपना इष्ट मानते हैं जबकि राम ही शिव और शिव ही राम है कृष्ण ही शिव और शिव ही कृष्णा है नाम अनेक लेकिन भगवान एक ही है रूप अलग है लेकिन आत्मा एक है जिसे परम आत्मा कहते हैं।
महादेव की महिमा का वर्णन करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जो सबकी रक्षा कर सकता है वही महादेव है और सब की रक्षा वही कर सकता है जो सबसे बलवान हो, बलवान वही होता है जिसे ज्ञान हो और परमात्मा के नाम से जाना जाता हो जो श्रोत्रिय भी हो और ब्रह्मनिष्ठ भी हो। भोले बाबा श्रोत्रिय भी हैं और ब्रह्मनिष्ठ भी हैं।
भगवान शिव के महादेव बनने के वृत्तांत को श्रावण मास एवं देवासुर संग्राम से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन श्रावण मास में ही हुआ था जिसमें 14 रत्न निकले उसी में एक विष भी था। सभी रत्नों को तो देवताओं ने आपस में बांट लिया लेकिन विष लेने को कोई तैयार नहीं हुआ। सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की तो उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण कर नील पर्वत पर विश्राम किया तथा गंगा की नीलधारा में स्नान कर विष की गर्मी को शांत किया। भगवान ने विष पीकर संपूर्ण विश्व की रक्षा की और सब की रक्षा करने के कारण ही वे महादेव कहलाए। देवताओं का अनुरोध स्वीकार करने पर ही सभी देवताओं ने उन्हें महादेव के नाम से पुकारा। महादेव सृष्टि के सृजक भी हैं और संहारक भी। देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक चार माह तक चातुर्मास में जब श्रीहरि शयनकाल के लिए क्षीरसागर में चले जाते हैं तो भगवान शिव ही सृष्टि का संचालन करते हैं, जिसमें एक माह श्रावण मास में वे हरिद्वार में रहकर ही सृष्टि का संचालन करते हैं।
मां गंगा जब स्वर्ग से धराधाम पर उतरीं तो भगवान शिव की जटाओं से होकर ही आई थीं तभी से भगवान शिव को गंगाजल प्रिय है।भगवान शिव ने श्रावण मास में ही विष को कंठ में धारण किया था जिसकी गर्मी (पाप) को शांत करने के लिए गंगाजल का प्रयोग किया गया था तभी से संपूर्ण भारतवर्ष के श्रद्धालु श्रावण मास में हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में भगवान के निराकार स्वरूप शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। श्रावण मास में रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। देश में शिवालयों की संख्या भी सर्वाधिक है और सभी देवी देवताओं की तुलना में भगवान महादेव के भक्त भी सर्वाधिक हैं।
कावड़ यात्रा का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि पहली कावड़ भगवान परशुराम ने हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर पुरा महादेव मंदिर में अभिषेक किया था तभी से देश के कोने-कोने से श्रद्धालु हरिद्वार आकर हर की पैड़ी से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।भगवान महादेव को गंगाजल प्रिय है और वह जलाभिषेक से ही प्रसन्न हो जाते हैं। कावड़ यात्रियों की संख्या वर्ष प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है, जलाभिषेक से भगवान शिव के प्रसन्न होने और शीघ्र प्रसन्न होने के कारण ही उनको महादेव कहा जाता है, इसीलिए महादेव के भक्तों की संख्या अन्य देवताओं की तुलना में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
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