उत्तर प्रदेश
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सपा- कांग्रेस में ऐसे बनी बात
Published: Thursday, October 22, 2026 at 10:37 AM
2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर न केवल उत्तर प्रदेश या भारत बाल्कि विदेशों की भी नज़रें टिकी हुई है। यह सर्व विदित है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी एवं समाजवादी पार्टी के अलावा किसी का जनाधार नहीं है। 2017 में सपा की सत्ता जाने के बाद 2019 और 24 का लोकसभा चुनाव हो या 2022 का विधानसभा चुनाव सभी में सपा और भाजपा की ही टक्कर रही और 2027 में भी पूरा चुनाव इन्हीं दोनों पार्टियों के मध्य होगा, जिसमें सपा - कांग्रेस के गठबंधन की भूमिका अहम होगी, दोनों पार्टियों में हुई बैठकों के बाद लगभग तय हो चुका है कि सीट बंटवारे का मसौदा एक सप्ताह में तय कर लिया जाएगा इसके लिए कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी को अधिकृत भी कर दिया गया है।
भारत के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटे हैं जिनमें 255 भाजपा ने जीती थीं जबकि सपा ने 101 एवं कांग्रेस के पास दो विधायक हैं। राजनीति का नियम है कि जो पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है उसका कार्यकर्ता अन्य दलों की ओर पलायन कर जाता है और यूपी में कांग्रेस 1989 के बाद सत्ता में वापसी नहीं कर पायी। इस साढे तीन दशक में पार्टी कार्यकर्ता ही नहीं नेता विहीन हो गई, हालांकि 2004 से 2014 तक केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही लेकिन यूपी में सपा, बसपा और भाजपा ने कब्जा जमा लिया। काफी समय तक सत्ता से बाहर रहने के बाद राहुल गांधी को महात्मा गांधी और अपने पिता राजीव गांधी का फार्मूला याद आया कि जनता उसी का साथ देती है जो जनता के बीच जाता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब से जनता के बीच जाना प्रारंभ किया तब से कांग्रेस में नई जान आ गई है, जिसे देखकर भाजपा की बेचैनी और बढ़ती जा रही है। कांग्रेस को यह एहसास भी हो गया है कि बिना गठबंधन के भाजपा को सत्ता से हटाया नहीं जा सकता उधर समाजवादी पार्टी भी 10 वर्ष सत्ता से बाहर रहकर यह समझ गई है कि बिना गठबंधन के दोबारा सत्ता में आना आसान नहीं है। सपा को यह भी याद है कि 2017 में उसकी सत्ता आपसी फूट और पारिवारिक कलह के कारण गई थी। सपा भी भविष्य में अपनी उस गलती को नहीं दोहराएगी। वर्तमान हालात के आधार पर यह तो पक्का हो गया है कि दोनों दल मिलकर ही 2027 का चुनाव लड़ेंगे।
जहां तक सीटों के बंटवारे का सवाल है तो दोनों दलों में इस बात पर भी मंथन हो चुका है कि अखिलेश को 2027 में यूपी की कुर्सी चाहिए तो राहुल गांधी की निगाह देश की बड़ी कुर्सी पर है। यदि 2027 में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन नहीं करती है तो 2029 में सपा भी कांग्रेस का साथ नहीं देगी, परिणामस्वरुप दोनों दल यदि बट गए तो सत्ता से मायूस रह जाएंगे और यदि यूपी में भाजपा की हैट्रिक लग गई तो सपा में भगदड मचने की आशंका है, क्योंकि नेता हो या कार्यकर्ता सभी सत्ता के लिए ही राजनीति करते हैं और कांग्रेस को यदि उत्तर प्रदेश का साथ नहीं मिला तो उसके लिए भी दिल्ली आसान नहीं होगी। जहां तक गठबंधन का सवाल है तो गठबंधन ही वह महान शक्ति है जिसके सहारे भाजपा सत्ता तक पहुंची और बीते वर्ष पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन से हल्की सी दूरी बनाई थी कि सत्ता से बेदखल हो गयीं। जहां तक उत्तर प्रदेश में सपा -कांग्रेस के गठबंधन का सवाल है तो यह तो गठबंधन पक्का है और सीटों के समझौते पर भी 50 से 75 सीटों पर अंतिम समझौता होना तय माना जा रहा है, भले ही कुछ सीटों पर सपा अपने सिंबल पर कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाये जो आपसी समझौते के आधार पर एक सप्ताह के अंदर लगभग तय हो जाएगा।
भारत के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटे हैं जिनमें 255 भाजपा ने जीती थीं जबकि सपा ने 101 एवं कांग्रेस के पास दो विधायक हैं। राजनीति का नियम है कि जो पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है उसका कार्यकर्ता अन्य दलों की ओर पलायन कर जाता है और यूपी में कांग्रेस 1989 के बाद सत्ता में वापसी नहीं कर पायी। इस साढे तीन दशक में पार्टी कार्यकर्ता ही नहीं नेता विहीन हो गई, हालांकि 2004 से 2014 तक केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही लेकिन यूपी में सपा, बसपा और भाजपा ने कब्जा जमा लिया। काफी समय तक सत्ता से बाहर रहने के बाद राहुल गांधी को महात्मा गांधी और अपने पिता राजीव गांधी का फार्मूला याद आया कि जनता उसी का साथ देती है जो जनता के बीच जाता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब से जनता के बीच जाना प्रारंभ किया तब से कांग्रेस में नई जान आ गई है, जिसे देखकर भाजपा की बेचैनी और बढ़ती जा रही है। कांग्रेस को यह एहसास भी हो गया है कि बिना गठबंधन के भाजपा को सत्ता से हटाया नहीं जा सकता उधर समाजवादी पार्टी भी 10 वर्ष सत्ता से बाहर रहकर यह समझ गई है कि बिना गठबंधन के दोबारा सत्ता में आना आसान नहीं है। सपा को यह भी याद है कि 2017 में उसकी सत्ता आपसी फूट और पारिवारिक कलह के कारण गई थी। सपा भी भविष्य में अपनी उस गलती को नहीं दोहराएगी। वर्तमान हालात के आधार पर यह तो पक्का हो गया है कि दोनों दल मिलकर ही 2027 का चुनाव लड़ेंगे।
जहां तक सीटों के बंटवारे का सवाल है तो दोनों दलों में इस बात पर भी मंथन हो चुका है कि अखिलेश को 2027 में यूपी की कुर्सी चाहिए तो राहुल गांधी की निगाह देश की बड़ी कुर्सी पर है। यदि 2027 में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन नहीं करती है तो 2029 में सपा भी कांग्रेस का साथ नहीं देगी, परिणामस्वरुप दोनों दल यदि बट गए तो सत्ता से मायूस रह जाएंगे और यदि यूपी में भाजपा की हैट्रिक लग गई तो सपा में भगदड मचने की आशंका है, क्योंकि नेता हो या कार्यकर्ता सभी सत्ता के लिए ही राजनीति करते हैं और कांग्रेस को यदि उत्तर प्रदेश का साथ नहीं मिला तो उसके लिए भी दिल्ली आसान नहीं होगी। जहां तक गठबंधन का सवाल है तो गठबंधन ही वह महान शक्ति है जिसके सहारे भाजपा सत्ता तक पहुंची और बीते वर्ष पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन से हल्की सी दूरी बनाई थी कि सत्ता से बेदखल हो गयीं। जहां तक उत्तर प्रदेश में सपा -कांग्रेस के गठबंधन का सवाल है तो यह तो गठबंधन पक्का है और सीटों के समझौते पर भी 50 से 75 सीटों पर अंतिम समझौता होना तय माना जा रहा है, भले ही कुछ सीटों पर सपा अपने सिंबल पर कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाये जो आपसी समझौते के आधार पर एक सप्ताह के अंदर लगभग तय हो जाएगा।
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